मंगलुरु में आज CBAI बाइबिल सम्मेलन शुरू, नौ शोध पत्र

6 नवंबर 2026 को मंगलुरु के शांति किरण पास्टोरल सेंटर, बज्जोडी के ज्योति निवास हॉल में कैथोलिक बाइबिलिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CBAI) का वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हुआ। दो दिवसीय सम्मेलन का विषय है "बाइबिल की सहायकता (Biblical Subsidiarity): भारत में सिनोडल चर्च के लिए एक दृष्टि"। सम्मेलन का उद्घाटन सुल्तानपेट के बिशप डॉ. पीटर अबीर ने किया, जिन्होंने उद्घाटन सत्र में एक पुस्तक का विमोचन भी किया।
कल्पना कीजिए: देश भर से आए बाइबिल विद्वान, धर्मशास्त्री और धार्मिक नेता एक हॉल में बैठे हैं, और सवाल यह नहीं है कि चर्च का अगला कार्यक्रम क्या होगा, बल्कि यह है कि चर्च में फैसले आखिर होते कैसे हैं — और होने कैसे चाहिए। नौ शोध पत्र, दो दिन, और अंत में एक दृष्टि-पत्र जो भारत के चर्च के लिए आगे का रास्ता तय करेगा। यह कोई साधारण बैठक नहीं है; यह चर्च के भीतर सत्ता और सहभागीता पर एक गंभीर बहस है।
सम्मेलन में बाइबिल विद्वान, धर्मशास्त्री और धार्मिक नेता एक साथ आए हैं ताकि चर्च में विकेंद्रीकृत भागीदारी और साझा अधिकार पर विचार कर सकें। यही सवाल आज दुनिया भर के चर्चों में उठ रहा है, और मंगलुरु में भारत के विद्वान इसका बाइबिल से जवाब खोज रहे हैं।
सहायकता क्या है? साल्दान्हा का मुख्य भाषण
मुख्य भाषण "बाइबिल की सहायकता: संगति की दिव्य रूपरेखा" सेंट अल्फोंसस इंस्टीट्यूट, बेंगलुरु के निदेशक डॉ. असिसी साल्दान्हा CSsR ने दिया। उन्होंने कहा कि सहायकता आधुनिक समाजशास्त्र से उधार ली गई अवधारणा नहीं है, बल्कि एक आंतरिक बाईबिल सिद्धांत है। उन्होंने इसका धर्मशास्त्रीय ढांचा उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक खोजा और बताया कि सच्ची बाइबिल सहायकता मानव गरिमा की रक्षा करती है, एकजुटता को बढ़ावा देती है और सिर्फ प्रशासनिक विकेंद्रीकरण से कहीं आगे जाती है।
यह दावा बड़ा है, और इसीलिए दिलचस्प है। सहायकता का विचार आमतौर पर राजनीति और प्रबंधन की किताबों से जुड़ा माना जाता है — कि फैसले उसी स्तर पर लिए जाएं जहां वे सबसे ठीक से लिए जा सकते हैं। साल्दान्हा कह रहे हैं कि यह सिद्धांत बाइबिल में पहले से मौजूद है, उत्पत्ति की कहानी से लेकर अंत तक। अगर वे सही हैं, तो चर्च में भागीदारी कोई आधुनिक फैशन नहीं, बल्कि बाइबिल की मांग है।
साल्दान्हा ने यह भी कहा कि सहायकता सिर्फ प्रशासनिक विकेंद्रीकरण से अलग है। विकेंद्रीकरण का मतलब हो सकता है कि काम बांट दिया जाए, लेकिन फैसले फिर भी ऊपर से आएं। सहायकता का मतलब है कि फैसले लेने की जिम्मेदारी भी साझा हो, और हर स्तर पर लोगों की गरिमा बनी रहे। यही बात इस सम्मेलन को सिर्फ अकादमिक बहस से आगे ले जाती है — यह चर्च के काम करने के तरीके पर सीधा सवाल है।
पहले दिन क्या हुआ: प्रार्थना, संबोधन और शोध पत्र
उद्घाटन कार्यक्रम की शुरुआत धर्माराम विद्या क्षेत्रम के LTh छात्रों की प्रार्थना सेवा से हुई। इसके बाद CBAI के अध्यक्ष और मंगलौर के बाइबिल आयोग के धर्मप्रांतीय सचिव डॉ. विंसेंट सेकेइरा ने अध्यक्षीय संबोधन दिया। शांति किरण पास्टोरल सेंटर के निदेशक फादर संतोष रॉड्रिग्स ने सभा का स्वागत किया और व्यवस्थाओं का समन्वय किया, जबकि सिस्टर प्रीमा AC ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा। CBAI के सचिव डॉ. जयप्रदीप ने पूरे सम्मेलन का समन्वय किया।
शैक्षणिक विचार-विमर्श की शुरुआत डॉ. थॉमस करिमुंडक्कल के प्रस्तुतीकरण से हुई। वे पुणे के पोंटिफिकल एथेनियम ज्ञान दीपा में धर्मशास्त्र के प्रोफेसर और डीन हैं, और उन्होंने उत्पत्ति 1-2 की सृष्टि कथा पर बात की। डॉ. साल्वाडोर फर्नांडीस के संचालन में इस सत्र में इमागो देई — यानी मनुष्य में ईश्वर की छवि — को साझा जिम्मेदारी, संबंधपरक उत्तरदायित्व और पर्यावरण की देखभाल की नींव के रूप में देखा गया।
पहले दिन की कार्यवाही में बिशप डॉ. पीटर अबीर की अध्यक्षता में पवित्र यूखरिस्त समारोह भी हुआ। इसके बाद पुराने नियम के नेतृत्व मॉडल पर डॉ. एलेक्स एंचेल्स, भविष्यवाणी के आह्वान पर डॉ. मैरी लीना CSSA, और परिवार इकाई (ओइकोस) पर ज्ञान साहित्य के नजरिए से डॉ. एंटनी सिजान मनुवेलिपरंबिल के शोध पत्र प्रस्तुत हुए।
नौ शोध पत्र, एक दृष्टि-पत्र
दो दिनों में कुल नौ शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे, जो भारत में सिनोडल चर्च के लिए एक दृष्टि-पत्र तैयार करने में मदद करेंगे। यह दृष्टि-पत्र ही सम्मेलन का असली नतीजा होगा — एक दस्तावेज जो बताएगा कि भारतीय चर्च सहायकता और सहभागिता को कैसे समझता है, और आगे कैसे काम करना चाहता है।
सिनोडल चर्च का विचार पोप फ्रांसिस के समय से दुनिया भर में चर्चा में है, और अब पोप लियो XIV के समय में भी जारी है। इसका मूल सवाल है कि चर्च में सबकी आवाज कैसे सुनी जाए — बिशपों की, पादरियों की, और आम विश्वासियों की भी।
मंगलुरु, बाइबिल अध्ययन का एक केंद्र
भारत में ईसाई समुदाय की कहानियां अक्सर मुश्किलों से जुड़ी होती हैं, और इस साइट पर वे दर्ज भी हुई हैं। कोलकाता प्रार्थना रैली: सैकड़ों ईसाई सड़कों पर, 48 हमले में 5 नवंबर को कोलकाता में हुई प्रार्थना रैली की खबर थी, और मणिपुर के नोनी में नागा गुटों की गोलीबारी, 3 ईसाई मारे गए में मणिपुर की हिंसा दर्ज थी। आज: कोलकाता में 5 नवंबर को तीन जुलूसों के साथ ईसाइयों की प्रार्थना रैली, 11 राज्यों के चर्च नेता शामिल होंगे में उसी रैली की घोषणा की गई थी।
लेकिन भारत के चर्च की कहानी सिर्फ मुश्किलों की नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में चर्च शिखर की तोड़फोड़ पर रोक लगाई में चर्च को अदालत से राहत मिली थी, और हैदराबाद में ईसाइयों के लिए कब्र की जगह खत्म: 300 किलोमीटर दूर खेत में दफनाए गए जॉन सुकुमार में समुदाय की एक अलग मुश्किल सामने आई थी। पश्चिम बंगाल में ईसाइयों के बाइबल सम्मेलन पर हमला: 1,900 आदिवासी विश्वासी घर भेजे गए में बाइबिल सम्मेलन पर हमले की खबर थी — उसी बाइबिल को लेकर, जिस पर मंगलुरु में विद्वान चर्चा कर रहे हैं।
और भी कहानियां हैं जो भारत के चर्च की तस्वीर पूरी करती हैं। आज: मणिपुर में पांच कुकी लोगों की हत्या से शांति वार्ता खतरे में, चर्च नेता ने जांच की मांग की में शांति वार्ता पर खतरे की खबर थी, मणिपुर कुकी-जो ईसाई आज: राष्ट्रपति शासन की मांग, 32 मौतों का दावा में राष्ट्रपति शासन की मांग दर्ज थी, और बंगाल ईसाई परिवार हमला आज: वेणुगोपाल ने अमित शाह को पत्र लिखा, 13 आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग में संसद तक पहुंची एक मांग की कहानी थी। आज: शिलांग में FCRA पर जेपीसी की बैठक, चर्चों को विदेशी चंदे का सिर्फ 6 प्रतिशत मिलने का दावा में चर्चों के पैसे पर बहस दर्ज है।
अब सवाल यह है कि मंगलुरु में दो दिन की बहस के बाद दृष्टि-पत्र में क्या लिखा जाएगा। क्या वह सिर्फ विद्वानों का दस्तावेज बनकर रह जाएगा, या भारत के धर्मप्रांतों में फैसले लेने का तरीका सच में बदलेगा? क्या सहायकता का बाइबिल दावा — कि यह समाजशास्त्र से नहीं, बाइबिल से आती है — चर्च के नेताओं को भी उतना ही छूएगा जितना विद्वानों को छू रहा है? मंगलुरु का यह सम्मेलन याद किया जाएगा — या तो एक मोड़ के रूप में, या एक बहस के रूप में जो कागजों में रह गई।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सम्मेलन 6 नवंबर 2026 को मंगलुरु के शांति किरण पास्टोरल सेंटर, बज्जोडी के ज्योति निवास हॉल में शुरू हुआ और दो दिन चलेगा। यह CBAI का वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन है।
विषय है "बाइबिल की सहायकता: भारत में सिनोडल चर्च के लिए एक दृष्टि"। इसमें चर्च में विकेंद्रीकृत भागीदारी और साझा अधिकार पर बाइबिल के नजरिए से विचार किया जा रहा है।
सुल्तानपेट के बिशप डॉ. पीटर अबीर ने उद्घाटन किया और उद्घाटन सत्र में एक पुस्तक का विमोचन भी किया। CBAI अध्यक्ष डॉ. विंसेंट सेकेइरा ने अध्यक्षीय संबोधन दिया।
मुख्य भाषण "बाइबिल की सहायकता: संगति की दिव्य रूपरेखा" सेंट अल्फोंसस इंस्टीट्यूट, बेंगलुरु के निदेशक डॉ. असिसी साल्दान्हा CSsR ने दिया। उन्होंने कहा कि सहायकता आधुनिक समाजशास्त्र से उधार ली गई अवधारणा नहीं, बल्कि एक आंतरिक बाइबिल सिद्धांत है।
दो दिनों में प्रस्तुत होने वाले नौ शोध पत्र भारत में सिनोडल चर्च के लिए एक दृष्टि-पत्र तैयार करने में मदद करेंगे, जो बताएगा कि भारतीय चर्च सहायकता और सहभागिता को कैसे समझता है।
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