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📰 FaithStories News Desk · Article #222 · Published: 25 Oct 2026, 05:26 AM PKT

मणिपुर कुकी-जो ईसाई आज: राष्ट्रपति शासन की मांग, 32 मौतों का दावा

मणिपुर की पहाड़ियों में एक साधारण चर्च में प्रार्थना करते कुकी-जो ईसाई परिवार
मणिपुर के कुकी-जो ईसाई समुदाय ने 21 अक्टूबर को दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की वापसी की मांग की है।

मंगलवार की सुबह एक 45 वर्षीय व्यक्ति जंगल में बांस की कोंपलें चुन रहा था। कांगपोकपी जिले के जंगल में अज्ञात बंदूकधारियों ने उस पर गोली चला दी, और वह वहीं गिर पड़ा। उसका साथी किसी तरह बचकर भाग निकला, लेकिन वह आदमी अपने गांव वापस नहीं लौट सका।

यह हत्या उस दिन हुई, जब एक दिन पहले पड़ोस के इलाके में घात लगाकर किए गए हमले में तीन मेइतेई ग्रामीण मारे गए थे। हिंसा की यह ताज़ा कड़ी दिल्ली तक पहुंची, और अगले दिन कुकी-जो महिलाओं के मंच ने एक सीधी मांग रख दी: राष्ट्रपति शासन फिर लागू हो।

कुकी-जो वीमेंस फोरम की यह मांग 21 अक्टूबर को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में रखी गई। कुकी-जो काउंसिल के प्रवक्ता गिंज़ा वुअलज़ोंग ने कहा कि समुदाय के लोग राष्ट्रपति शासन के दौरान ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते थे। उन्होंने केंद्र से अपील की कि कुकी-जो लोगों की सुरक्षा और गरिमा के लिए केंद्रीय शासन वापस लाया जाए।

मणिपुर कुकी-जो 32 मौतों का दावा: मार्च 2026 से क्या हुआ?

फोरम का दावा है कि मार्च 2026 से अब तक समुदाय के कम से कम 32 लोग मारे गए हैं। इनमें 12 महिलाएं शामिल हैं, जिनमें दो गर्भवती महिलाएं भी थीं। फोरम ने यह भी दावा किया कि 14 कुकी-जो गांवों में करीब 55 घर जला दिए गए।

इन हमलों के लिए फोरम ने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड के इसाक-मुइवा गुट (NSCN-IM) और ज़ेलियांगरोन्ग यूनाइटेड फ्रंट (ZUF-कामसन) को ज़िम्मेदार ठहराया है। फोरम ने इन कथित हमलों की जांच और युद्धविराम उल्लंघन पर जवाबदेही की मांग की है।

ये आंकड़े फोरम के दावे हैं। इनकी आधिकारिक पुष्टि का इंतज़ार है, और इन खबरों में सरकार की ओर से इन पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन कब लगा था? फरवरी 2025 से फरवरी 2026 तक

केंद्र सरकार ने मणिपुर में 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लगाया था। यह कदम तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद उठाया गया था।

करीब एक साल बाद, 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और चुनी हुई सरकार बहाल कर दी गई। फोरम का कहना है कि राष्टपति शासन के दौरान कोई कुकी-जो नागरिक हिंसा में नहीं मारा गया था। इसी तुलना के आधार पर वह केंद्रीय शासन की वापसी को सुरक्षा का रास्ता बता रहा है।

मणिपुर में जातीय हिंसा तीन साल से ज़्यादा समय से चल रही है, और कुकी-जो ईसाई समुदाय इसके सबसे ज़्यादा प्रभावित समुदायों में गिना जाता है। मणिपूर के पहाड़ी गांवों में रहने वाले परिवारों के लिए यह हिंसा दूर की खबर नहीं है, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का डर है।

मणिपुर संकट राजनीतिक है या सुरक्षा का मुद्दा? गिंज़ा वुअलज़ोंग का बयान

प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिंज़ा वुअलज़ोंग ने एक बात बार-बार दोहराई: मणिपुर का संकट सिर्फ सुरक्षा बल भेजकर हल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि तीन साल से यही तरीका आज़माया जा रहा है, और वह काम नहीं कर रहा है।

"हमारी राजनीतिक मांग सिर्फ राजनीतिक मांग नहीं है। यह हमारे जीने का सवाल है। हम जीना चाहते हैं।"

यह पंक्ति गिंज़ा वुअलज़ोंग की है, जो उन्होंने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही। उन्होंने कहा कि सरकार इसे सुरक्षा का मुद्दा समझकर बड़ी संख्या में सुरक्षा बल भेज रही है, जबकि यह राजनीतिक मुद्दा है।

मणिपुर कुकी-जो गांवों में महंगाई: गैस सिलेंडर 3000 रुपये तक

हिंसा के साथ-साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी भी मुश्किल हो गई है। फोरम के अनुसार, बाज़ारों तक पहुंच पर पाबंदियों के कारण ज़रूरी सामान की कीमतें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गई हैं। कुछ इलाकों में रसोई गैस का सिलेंडर करीब 3000 रुपये तक पहुंच गया है।

कांगपोकपी, उखरुल, कामजोंग और लोंगपी इलाके में भी यही हाल बताया गया है। फोरम ने मारे गए लोगों के परिवारों और घर खोने वालों के लिए अनुग्रह राशि (ex-gratia) भी मांगी है।

भारत में ईसाई समुदायों की चिंता सिर्फ मणिपुर तक सीमित नहीं है। बंगाल के पटलापुर गांव में तीन ईसाई परिवारों पर कथित हमले के बाद भी दिल्ली तक आवाज़ पहुंची थी। झारखंड के खूंटी में फादर बेनेडिक्ट बारला पर हमला भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।

राजस्थान में 13 ईसाइयों की चार महीने बाद रिहाई और भारत में मसीही सताव के बीच कलीसिया के टिके रहने की कहानी बताते हैं कि अलग-अलग राज्यों में विश्वासी एक जैसे सवालों से जूझ रहे हैं।

कुकी-जो अलग प्रशासन की मांग: विधायिका वाली केंद्र शासित प्रदेश की मांग

राष्ट्रपति शासन के साथ-साथ, कुकी-जो काउंसिल ने अलग प्रशासन की पुरानी मांग भी दोहराई है। वह विधायिका वाली केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) के रूप में अलग प्रशासन चाहता है। फोरम का कहना है कि लंबे जातीय संघर्ष ने समुदाय का मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा कम कर दिया है।

गिंज़ा वुअलज़ोंग ने साफ किया कि समुदाय भारत से अलग होना नहीं चाहता है। वह एक संवैधानिक व्यवस्था चाहता है, जिसमें कुकी-जो लोग सुरक्षा और गरिमा के साथ जी सकें।

मणिपुर कुकी-जो मांग पर आगे क्या होगा? दिल्ली के फैसले का इंतज़ार

अब सबकी नज़र दिल्ली पर है। क्या केंद्र राष्ट्रपति शासन की मांग पर विचार करेगा, या राजनीतिक संवाद का नया रास्ता खोलेगा? क्या जांच और मुआवज़े पर कोई कदम उठेगा?

जंगल में बांस की कोंपलें चुनने गए उस आदमी के परिवार के लिए ये सवाल कागज़ी नहीं हैं। उनके लिए हर दिन का सवाल यही है कि अगली सुबह गांव सुरक्षित रहेगा या नहीं। चर्चों की प्रार्थनाएं अब भी जारी हैं, लेकिन एक सवाल बाकी है: क्या दिल्ली इस बार सुरक्षा बलों से आगे बढ़कर राजनीतिक हल की ओर कदम बढ़ाएगी?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मणिपुर में कुकी-जो ईसाई समुदाय ने क्या मांग की है?

कुकी-जो वीमेंस फोरम ने 21 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन फिर से लागू करने की मांग की है। साथ ही उसने अलग प्रशासन, जांच और राजनीतिक संवाद की मांग की है। (स्रोत: UCA News, The Hindu)

कुकी-जो समुदाय के 32 मौतों के दावे का आधार क्या है?

फोरम का दावा है कि मार्च 2026 से समुदाय के कम से कम 32 लोग मारे गए हैं, जिनमें दो गर्भवती महिलाओं सहित 12 महिलाएं थीं, और 14 गांवों में करीब 55 घर जला दिए गए। ये फोरम के दावे हैं; आधिकारिक पुष्टि का इंतज़ार है। (स्रोत: The Hindu, Deccan Herald)

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन कब लगा और कब हटा?

मणिपुर में 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लगा था और 4 फरवरी 2026 को हटा लिया गया था। फोरम का कहना है कि उस दौरान कोई कुकी-जो नागरिक हिंसा में नहीं मारा गया था। (स्रोत: UCA News, The Hindu)

गिंज़ा वुअलज़ोंग ने मणिपुर संकट के बारे में क्या कहा?

गिंज़ा वुअलज़ोंग ने कहा कि मणिपुर का संकट राजनीतिक मुद्दा है, न कि सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा, और तीन साल से सुरक्षा बल भेजने का तरीका काम नहीं कर रहा है। (स्रोत: The Telegraph, Deccan Herald)

कुकी-जो समुदाय अलग प्रशासन क्यों मांग रहा है?

फोरम का कहना है कि लंबे संघर्ष ने मौजूदा व्यवस्था पर भरोसा कम कर दिया है, इसलिए विधायिका वाली केंद्र शासित प्रदेश के रूप में अलग प्रशासन उसके जीने के लिए ज़रूरी है। समुदाय भारत से अलग होना नहीं चाहता। (स्रोत: The Hindu, India Today NE)

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