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📰 FaithStories News Desk · Article #537 · Published: 04 Nov 2026, 06:09 PM UTC

हैदराबाद में ईसाइयों के लिए कब्र की जगह खत्म: 300 किलोमीटर दूर खेत में दफनाए गए जॉन सुकुमार

हैदराबाद में सुनहरी शाम की रोशनी में एक भीड़भाड़ वाला पुराना ईसाई कब्रिस्तान, पुराने खराब मकबरों के बीच कुछ नए चमकदार मकबरे, साड़ी पहनी एक महिला फूलों के साथ कब्र के पास खड़ी, बिना टेक्स्ट
क्रिश्चियनिटी टुडे की 4 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, हैदराबाद के ईसाई कब्रिस्तान अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच चुके हैं।

तीन दिन तक सुनीता रानी ने फोन किए, पत्र लिए और नेताओं से सिफारिशें माँगीं। उनके पति जॉन सुकुमार का शव घर में था, और हैदराबाद में एक कब्र की जगह नहीं मिल रही थी। अंत में परिवार को शव लगभग 300 किलोमीटर दूर, पैतृक गाँव रावुलापाडु ले जाना पड़ा, और अपने ही खेत में दफनाना पड़ा।

क्रिश्चियनिटी टुडे की 4 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु, मुंबई, कोलकाता और दिल्ली के लगभग सभी ईसाई कब्रिस्तान अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कब्रिस्तान अब केवल पुरानी कब्रों के पुनः उपयोग की अनुमति देते हैं — एक ही प्लॉट में ताबूतों को एक के ऊपर एक रखकर — और वह भी केवल तभी, जब परिवार के सदस्य पहले से वहाँ दफन हों।

रानी और उनके बच्चों ने जॉन सुकुमार को हैदराबाद में दफनाना चाहा, जहाँ वे लगभग 41 साल रहे, जहाँ उन्होंने रानी से विवाह किया, काम किया और बच्चों को पाला। क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार, परिवार ने तीन दिन तक जगह पाने की कोशिश की: ईसाई नेताओं और नागरिक अधिकारियों को फोन किए, प्रभावशाली परिचितों से पत्र लिए — फिर भी कुछ नहीं हुआ, क्योंकि ज़मीन ही नहीं बची थी।

परिवार ने अनिच्छा से शव को गाँव ले जाकर अपने खेत में दफनाया, क्रिश्चियनिटी टुडे की रिपोर्ट के अनुसार। रानी ने क्रिश्चियनिटी टुडे से कहा: "हमारे पास पारिवारिक कब्र नहीं थी। वरना हम उसका उपयोग कर सकते थे; कोई भी इसके लिए पहले से तैयारी नहीं करता।"

परिवार ने खेत में दफन पर लगभग 1,00,000 रुपये खर्च किए — ताबूत और कब्र खोदने वालों की लागत के अलावा शव वाहन और गाँव में अनुमतियाँ लेने की फीस भी, क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार, जो लगभग 1,000 अमेरिकी डॉलर के बराबर था। रानी ने कहा: "पैसे की बात भूल जाइए। हम शांति से शोक नहीं मना सके।"

कब्र की जगह की कमी सभी चर्चों, संप्रदायों और शहरों के ईसाइयों को प्रभावित करती है, क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार। लेकिन नए स्वतंत्र करिश्माई हाउस चर्चों और स्टोरफ्रंट चर्चों के सदस्य सबसे अधिक पीड़ित हैं, क्योंकि उनके पास पुराने कब्रिस्तान में पारिवारिक प्लॉट नहीं हैं।

कोलकाता के क्रिश्चियन ब्यूरियल बोर्ड के अध्यक्ष इवान एम. सत्यव्रता ने क्रिश्चियनिटी टुडे से कहा कि बोर्ड "सभी ईसाइयों के लिए अपने प्रियजनों को आराम देने की जगह प्रदान करने की आवश्यकता के प्रति प्रतिक्रिया देने की नैतिक और नैतिक ज़िम्मेदारी महसूस करता है"।

अदालतों तक पहुँचा कब्रिस्तान का मामला

कुछ शहरों में अधिकारियों ने ईसाई कब्रिस्तान के लिए ज़मीन चिह्नित की, क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार, लेकिन विश्वासी कहते हैं कि वह ज़मीन भर चुकी है या भरने के करीब है। नए कब्रिस्तान उन शहरों से 30 से 60 किलोमीटर दूर हैं। रानी ने कहा कि 50 किलोमीटर दूर, घर से बिना संबंध वाली जगह पर पति को आराम देना समझ में नहीं आता था।

कब्रिस्तान की जगह की कमी अदालतों तक पहुँची है, क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार। रिपोर्ट का सारांश कहता है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि दफन को व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जा सकता; बॉम्बे उच्च न्यायालय ने दो साल की समय-सीमा में दफन प्लॉट का आदेश दिया; मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि अधिकारी कब्रिस्तानों को "खेत की तरह नहीं जोत सकते"। ये आदेश केवल क्रिश्चियनिटी टुडे के सारांश के श्रेय सहित लिखे जा रहे हैं, क्योंकि अदालतों के स्रोत-लिंक खोले नहीं गए।

कुछ कब्रिस्तानों ने जगह बचाने के लिए नए समाधान अपनाए हैं, क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार। चेन्नई के अंतिम संस्कार निदेशक सिम्पसन कुमार के अनुसार, कुछ ईसाई दाह-संस्कार पर विचार कर रहे हैं, जिसमें राख दो फुट बाय दो फुट के गड्ढे में दफनाई जाती है, जबकि सामान्य दफन छह फुट बाय तीन फुट का होता है।

केरल में वर्टिकल मल्टी-टियर वॉल्ट प्रमुख हो रहे हैं। कुमार ने कहा: "जगह की कमी एक वास्तविक मुद्दा है।"

हैदराबाद के पुराने कब्रिस्तान और समुदाय की माँग

हैदराबाद-सिकंदराबाद में 13 कब्रिस्तान हैं, जो मूल रूप से निज़ाम और ब्रिटिश शासकों द्वारा दिए गए थे, डेक्कन क्रॉनिकल की 30 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार। नारायणगुड़ा कब्रिस्तान 250 साल से अधिक पुराना है, 10 एकड़ में फैला है, और केयरटेकर जक्करगारी गेब्रियल के अनुसार 1990 से 30,000 से अधिक दफन दर्ज हैं।

डेक्कन क्रॉनिकल ने दर्ज किया है कि समुदाय ने कब्रिस्तानों में अतिक्रमण और खराब रखरखाव को लेकर चिंता जताई है, और यह बात यहाँ केवल दर्ज चिंता के रूप में लिखी जा रही है। एक पुराने कब्रस्तान की दीवार के पास खड़े होकर यह समझना मुश्किल नहीं है कि रखरखाव की चिंता क्यों उठती है।

गोवा में सभी संतों के पर्व पर बच्चों की भागीदारी की कहानी गोवा में सभी संतों का पर्व: सैकड़ों बच्चे संत बनकर चर्च पहुँचे में है, और परिवारों से रोज़री की परंपरा बचाने का आह्वान वेरापोली के आर्चबिशप ने परिवारों से कहा: रोज़री की परंपरा को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखें में दर्ज है। भारत में मसीही समुदाय के दबाव की व्यापक तस्वीर भारत में मसीही सताव 2026: बढ़ते दबाव के बीच कलीसिया कैसे टिकी हुई है में दी गई है।

सुनीता रानी की कहानी में जॉन सुकुमार की मृत्यु की तारीख इस लेख में नहीं दी गई है, क्योंकि क्रिश्चियनिटी टुडे केवल "पिछले साल, 66 वर्ष की आयु में" कहता है। जो बचा है, वह एक सवाल है: जब शहर की ज़मीन खत्म हो जाए, तो एक परिवार अपने प्रियजन को कहाँ आराम देगा — और क्या अगली बार भी उसे 300 किलोमीटर दूर, अपने ही खेत में, शांति से शोक मनाए बिना दफनाना पड़ेगा?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जॉन सुकुमार को हैदराबाद में क्यों नहीं दफनाया जा सका?

क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार, परिवार ने तीन दिन तक हैदराबाद के एक ईसाई कब्रिस्तान में जगह पाने की कोशिश की, लेकिन ज़मीन नहीं बची थी, क्योंकि शहर के कब्रिस्तान अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच चुके हैं।

परिवार ने अंत में क्या किया?

परिवार ने शव को लगभग 300 किलोमीटर दूर पैतृक गाँव रावुलापाडु ले जाकर अपने खेत में दफनाया, क्रिश्चियनिटी टुडे की रिपोर्ट के अनुसार। दफन पर लगभग 1,00,000 रुपये खर्च हुए।

क्या यह समस्या केवल हैदराबाद की है?

नहीं। क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार, चेन्नई, बेंगलुरु, मुंबई, कोलकाता और दिल्ली के लगभग सभी ईसाई कब्रिस्तान भी अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच चुके हैं, और नए स्वतंत्र चर्चों के सदस्य सबसे अधिक प्रभावित हैं।

जगह बचाने के लिए क्या समाधान अपनाए जा रहे हैं?

क्रिश्चियनिटी टुडे के अनुसार, कुछ ईसाई दाह-संस्कार पर विचार कर रहे हैं, जिसमें राख दो फुट बाय दो फुट के गड्ढे में दफनाई जाती है, और केरल में वर्टिकल मल्टी-टियर वॉल्ट प्रमुख हो रहे हैं। संख्या छोटी लेकिन बढ़ती बताई गई है।

अदालतों ने इस मामले में क्या कहा है?

क्रिश्चियनिटी टुडे के सारांश के अनुसार, दिल्ली, बॉम्बे और मद्रास उच्च न्यायालयों ने दफन के लिए ज़मीन को लेकर अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। इस लेख में केवल सारांश श्रेय सहित दिया गया है, क्योंकि अदालतों के स्रोत-लिंक खोले नहीं गए।

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