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📰 FaithStories News Desk · Article #491 · Published: 03 Nov 2026, 05:48 AM UTC

आज: शिलांग में FCRA पर जेपीसी की बैठक, चर्चों को विदेशी चंदे का सिर्फ 6 प्रतिशत मिलने का दावा

शिलांग की पहाड़ियों में एक चर्च की इमारत और सुबह की नरम रोशनी में बैठक के लिए जाते लोग, बिना किसी लिखावट के
शिलांग में 2 नवंबर को FCRA विधेयक पर जेपीसी की बैठक हुई। अध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा कि विदेशी अंशदान का सिर्फ लगभग 6 प्रतिशत चर्चों और धार्मिक संगठनों को मिलता है, जागरण और नेशनल हेराल्ड के अनुसार।

22,000 करोड़ रुपये। सिर्फ 6 प्रतिशत। और एक पहाड़ी शहर में बैठे लगभग 20 संगठन, जो यह तय करने की कोशिश कर रहे थे कि एक नया कानून उनके स्कूलों, अस्पतालों और चर्चों का क्या करेगा।

शिलांग में 2 नवंबर को FCRA संशोधन विधेयक पर बनी जेपीसी की बैठक के बाद समिति के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने पत्रकारों से कहा कि देश में मिलने वाले कुल 22,000 करोड़ रुपये के विदेशी चंदे में से चर्च और अन्य धार्मिक संगठनों की हिस्सेदारी मात्र छह प्रतिशत है, जागरण के अनुसार। नेशनल हेराल्ड ने भी, समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से, यही आंकड़ा दर्ज किया है।

यह बैठक ईसाई-बहुल राज्य मेघालय के मुख्यमंत्री कानराड के. संगमा के विशेष आग्रह पर शिलांग में आयोजित की गई थी, जागरण और नेशनल हेराल्ड के अनुसार। इसमें चर्चों, हिंदू समूहों और स्वदेशी समुदायों से जुड़े लगभग 20 संगठनों ने हिस्सा लिया। जायसवाल ने कहा, «हमारी रुचि राष्ट्रीय हित में है। हम किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित हितधारकों की बात सुन रहे हैं और व्यावहारिक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान चाहते हैं।»

यह आंकड़ा — 6 प्रतिशत — एक बहस के बीच में आया है, और इस लेख में उसे एक दावे के रूप में ही रखा गया है, क्योंकि वह समिति अध्यक्ष के बयान पर आधारित है, किसी स्वतंत्र ऑडिट पर नहीं। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस विधेयक के कुछ प्रावधानों से ईसाई एनजीओ और अल्पसंख्यक संचालित सामाजिक व शैक्षणिक संस्थानों का वैध विदेशी फंड प्रभावित हो सकता है, जागरण के अनुसार। सरकार का कहना है कि यह प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म को लक्षित नहीं करता है, बल्कि इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान को पारदर्शी तरीके से विनियमित करना है।

FCRA संशोधन विधेयक 2026: संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण का विवाद और चर्च संगठनों की चिंता

विवाद का केंद्र वह प्रावधान है, जिसके तहत सरकार की शक्तियां विदेशी अंशदान और उससे बनी संपत्तियों पर बढ़ाई जाएंगी, जब किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाए, वापस ले लिया जाए या नवीनीकृत न हो, नेशनल हेराल्ड के अनुसार। प्रस्तावित ढांचे के तहत, सरकार द्वारा नियुक्त एक नामित प्राधिकारी ऐसे संगठन से जुड़े विदेशी अंशदान और संपत्तियों का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकता है, उन पर अस्थायी नियंत्रण कर सकता है और निर्दिष्ट परिस्थितियों में उन्हें स्थानांतरित या निपटा सकता है।

चर्च निकायों और नागरिक समाज संगठनों ने चेतावनी दी है कि ये प्रावधान उन संस्थानों को प्रभावित कर सकते हैं, जैसे स्कूल, अस्पताल, धर्मार्थ प्रतिष्ठान और पूजा स्थल, जो दशकों से विदेशी दान से बने हैं, नेशनल हेराल्ड के अनुसार। उनकी चिंता प्रस्तावित ढांचे के संभावित पूर्वव्यापी प्रभावों और ऐसी संपत्तियों पर कार्यकारी शक्तियों की सीमा को लेकर भी है। सरकार ने कहा है कि यह कानून धर्म-विशिष्ट नहीं है और इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान के नियमन को मजबूत करना और जवाबदेही बढ़ाना है।

शिलांग बैठक: 20 संगठन, मुख्यमंत्री संगमा का आग्रह और चेन्नई-कोच्चि में अगली बैठकें

शिलांग की बैठक में जो लोग बैठे थे, वे सिर्फ आंकड़ों के प्रतिनिधि नहीं थे। वे उन संगठनों के लोग थे, जो मेघालय की पहाड़ियों में चर्च, स्कूल और सामुदायिक काम चलाते हैं, और जिनके लिए विदेशी अंशदान का सवाल प्राथना की जगह से आगे, रोजमर्रा की जिंदगी का सवाल है। जायसवाल ने कहा कि समिति विभिन्न वर्गों से सुझाव जुटा रही है, ताकि प्रस्तावित संशोधनों के प्रभावों को समझा जा सके, नेशनल हेराल्ड के अनुसार।

«देश में विदेशी अंशदान के रूप में आने वाले 22,000 करोड़ रुपये में से करीब छह प्रतिशत ही गिरजाघरों और अन्य धार्मिक संगठनों को मिलता है। शेष राशि एनजीओ और अन्य संगठनों को जाती है।» — संजय जायसवाल, जेपीसी अध्यक्ष, पत्रकारों से, शिलांग, 2 नवंबर, नेशनल हेराल्ड और जागरण के अनुसार।

समिति अब हितधारकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए चेन्नई और कोच्चि में परामर्श बैठकें आयोजित करेगी, जागरण और नेशनल हेराल्ड के अनुसार। विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था, और 12 अगस्त को विपक्ष के विरोध के बीच उसे संयुक्त समिति के पास भेजा गया था, नेशनल हेराल्ड ने लिखा।

भारत में ईसाई संगठन और विदेशी अंशदान: 6 प्रतिशत के दावे का क्या मतलब है

6 प्रतिशत का आंकड़ा, अगर सही है, तो एक तस्वीर बदलता है: वह बताता है कि विदेशी चंदे का बड़ा हिस्सा धार्मिक संगठनों के पास नहीं जाता। लेकिन वह आंकड़ा अकेले असर नहीं बताता, क्योंकि विवाद रकम पर नहीं, संपत्ति पर नियंत्रण की शक्ति पर है। यही कारण है कि शिलांग में बैठे संगठनों की चिंता आंकड़े से आगे जाती है: उन्हें डर है कि पंजीकरण खत्म होने पर दशकों से बनी संपत्ति पर उनका नियंत्रण छिन सकता है।

भारत में ईसाई समुदाय की खबरें इस साइट पर और भी पढ़ी जा सकती हैं, जैसे मणिपुर में पांच कुकी लोगों की हत्या से शांति वार्ता के खतरे में पड़ने की खबर, गुमला में कब्र पर्व, जहां 750 कब्रों पर मोमबत्तियां जलाई गईं, गोवा में सभी संतों का पर्व, जहां सैकड़ों बच्चे संत बनकर चर्च पहुंचे, वेरापोली के आर्चबिशप का परिवारों से रोज़री की परंपरा बचाकर रखने का आह्वान और छत्तीसगढ़ के भंडारडीगी में ईसाई परिवारों पर हमले की खबर।

जब समिति चेन्नई और कोच्चि जाएगी, तो शिलांग की पहाड़ियों में उठा सवाल उसके साथ जाएगा: क्या 6 प्रतिशत का आंकड़ा चर्चों की चिंता को कम करेगा, या फिर चिंता का असली कारण वह शक्ति है, जो आंकड़े में नहीं दिखती — वह शक्ति, जो किसी दिन किसी स्कूल, किसी अस्पताल या किसी चर्च की चाबी किसी और के हाथ में दे सकती है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिलांग में FCRA पर जेपीसी की बैठक कब हुई और किसने क्या कहा?

2 नवंबर को शिलांग की बैठक के बाद अध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा कि 22,000 करोड़ रुपये के विदेशी अंशदान का सिर्फ लगभग 6 प्रतिशत चर्चों और धार्मिक संगठनों को मिलता है, जागरण और नेशनल हेराल्ड के अनुसार।

शिलांग में बैठक क्यों आयोजित की गई?

मुख्यमंत्री कानराड के. संगमा के आग्रह पर, ताकि राज्य के हितधारकों की चिंताएं सुनी जा सकें, जागरण और नेशनल हेराल्ड के अनुसार। बैठक में लगभग 20 संगठन थे।

FCRA संशोधन विधेयक पर विवाद किस बात पर है?

नेशनल हेराल्ड के अनुसार, विवाद उन प्रावधानों पर है, जिनसे सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी पंजीकरण खत्म होने पर विदेशी अंशदान और उससे बनी संपत्तियों का प्रबंधन ले सकता है। चर्च संगठनों को स्कूलों, अस्पतालों और पूजा स्थलों पर असर का डर है, जबकि सरकार का कहना है कि कानून धर्म-विशिष्ट नहीं है।

समिति की अगली बैठकें कहां होंगी?

चेन्नई और कोच्चि में, हितधारकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए, जागरण और नेशनल हेराल्ड के अनुसार। विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश हुआ था और 12 अगस्त को संयुक्त समिति के पास भेजा गया था।

क्या यह खबर एक ही स्रोत पर आधारित है?

काफी हद तक, हां: दोनों खबरें पीटीआई के इनपुट पर आधारित हैं, जिनमें एक ही बैठक, बयान और आंकड़ा है। दोनों को खोला गया है, पर वे स्वतंत्र जांच नहीं हैं; 6 प्रतिशत अध्यक्ष का दावा है, ऑडिट का निष्कर्ष नहीं।

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