रांची में ग्राम सभा ने पादरियों के प्रवेश पर रोक लगाई: बोर्ड पर PESA का हवाला

बोड़ेया चौक पर लगा बोर्ड अब गाँव से गुजरने वाले हर व्यक्ति की नजर खींच लेता है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 की ग्राम सभा के बाद यह बोर्ड वहाँ लगाया गया। अब सवाल सिर्फ फैसले का नहीं है, बल्कि यह भी है कि ग्राम सभा को ऐसा फैसला लेने का अधिकार है या नहीं।
ग्राम सभा ने फैसला किया कि ईसाई पादरियों, प्रचारकों और मिशनरियों को गाँव में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। बीमारी ठीक करने के नाम पर होने वाली चंगाई प्रार्थना सभाओं और प्रार्थना उत्सवों पर भी रोक लगाई गई। यह फैसला दैनिक जागरण की 26 अक्टूबर और टाइम्स ऑफ इंडिया की 27 अक्टूबर की रिपोर्टों में दर्ज है।
खबरों में गाँव के नाम की वर्तनी अलग-अलग छपी है, इसलिए एक बात शुरुआत में ही साफ कर दी जाए। कुछ रिपोर्टों में इसे बोरेया लिखा गया है, लेकिन इस लेख में नाम बोड़ेया ही इस्तेमाल किया गया है। पंचायत में बोड़ेया और संगरामपुर गाँव आते हैं, बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान अनिल उरांव ने की, और संगरामपुर में भी ऐसा ही बोर्ड लगाने की योजना है।
बोड़ेया में पादरियों के प्रवेश पर रोक: मुखिया ने क्या कहा
मुखिया सोमा उरांव ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि फैसले का उद्देश्य आदिवासी संस्कृति और विरासत की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि कथित तौर पर प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण रोका जाना चाहिए, और पादरियों के प्रवेश पर रोक इसी सोच का हिस्सा है। इसी बयान से पता चलता है कि फैसले के पीछे क्या तर्क दिया जा रहा है।
हमारा उद्देश्य आदिवासी रीति-रिवाजों की रक्षा करना है। हम पादरियों को गाँवों में आकर गलत धर्मांतरण करने की अनुमति नहीं दे सकते।
सोमा उरांव ने आरोप लगाया कि आदिवासी निवासियों को भौतिक लाभों का वादा करके लुभाया जाता है। यह आरोप उन्हीं का है, और इसे साबित तथ्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि रिपोर्टों में इसके समर्थन में कोई सबूत दर्ज नहीं है। आदिवासी पुजारी विश्वकर्मा पाहन ने कदम का समर्थन करते हुए कहा कि आदिवासी लोग सीधे-सादे होते हैं और प्रलोभन के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं।
झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति, धुर्वा की अध्यक्ष मेघा उरांव ने जागरण के अनुसार कहा कि धर्मांतरण से आदिवासी समाज, धर्म और संस्कृति की व्यवस्था और पारंपरिक स्वशासन को नुकसान पहुँचता है। जनजाति सुरक्षा मंच के क्षेत्रीय समन्वयक संदीप उरांव ने कहा कि पाँचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में ग्राम सभाओं के पास व्यापक अधिकार हैं। यह एक कानूनी दावा है, और इसे संदीप उरांव के मत के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए, न कि कानून की अंतिम व्याख्या के रूप में।
PESA धारा 4 क्या कहती है और बोड़ेया बोर्ड की वैधता क्यों सवालों में है
पंचायत ने फैसले के समर्थन में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी PESA की धारा 4 का हवाला दिया है। यह धारा अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को परंपराओं, रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विवाद समाधान की रक्षा का अधिकार देती है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने यह भी दर्ज किया है कि अधिनियम किसी धार्मिक समूह के प्रवेश पर रोक या कानूनी धार्मिक गतिविधि पर पाबंदी का स्पष्ट अधिकार नहीं देता।
इसीलिए रोक की वैधता खबर लिखे जाने तक अपुष्ट थी, और इसे न तो वैध कहा जा सकता है और न ही अवैध। रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने कहा कि अनुमंडल अधिकारी और स्थानीय पुलिस को मामले का परीक्षण करने को कहा गया है। अब सबकी नजर इसी परीक्षण पर है, क्योंकि यही तय करेगा कि बोड़ेया चौक का बोर्ड वहाँ टिका रहेगा या हटेगा।
कानून और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच ऐसा ही टकराव छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती वाली खबर में भी दिखा था, जहाँ अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। बोड़ेया का मामला जिला प्रशासन के परीक्षण के दायरे में है। फिर भी दोनों खबरें एक ही सवाल से जुड़ी हैं कि कानून की सीमा कहाँ खत्म होती है और आस्था की आजादी कहाँ शुरू होती है।
बोड़ेया से पहले पुरियो और हाटी में भी लगे थे बोर्ड
बोड़ेया अकेला गाँव नहीं है जहाँ ऐसा बोर्ड लगा है। टाइम्स ऑफ इंडिया और जागरण के अनुसार, इससे पहले पुरियो पंचायत के हरमू सलोटोली, इटकी प्रखंड और लोहरदगा के हाटी गाँव में भी ऐसे बोर्ड लगे थे। आयोजकों ने कहा है कि अभियान PESA वाले अन्य गाँवों तक फैलेगा, और आदिवासी अधिकारों पर सेमिनार भी होंगे।
झारखंड में ही ईसाई समुदाय से जुड़ी एक और खबर खूंटी में फादर बेनेडिक्ट बारला पर हमले की थी, जहाँ एक पादरी पर जानलेवा हमला हुआ था। बोड़ेया में कोई हिंसा रिपोर्ट नहीं हुई है, और विवाद फैसले और बोर्ड तक सीमित है। धर्मांतरण के आरोपों पर पश्चिम बंगाल में ईसाई परिवारों पर हमले के मामले में भी बहस हुई थी, मगर बोड़ेया का फैसला ग्राम सभा की बैठक में लिया गया था।
एक बात रिपोर्टों में नहीं दिखती, और वह है ईसाई पक्ष की प्रतिक्रिया। पढ़ी गई रिपोर्टों में किसी ईसाई नेता या प्रभावित पादरी की कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है, इसलिए इस लेख में कोई प्रतिक्रिया गढ़ी नहीं गई है। भारत में मसीही समुदाय पर दबाव की बड़ी तस्वीर बढ़ते दबाव के बीच कलीसिया के टिके रहने की कहानी में दर्ज है, मगर बोड़ेया में दबाव किसी हमले से नहीं, बल्कि एक लिखित फैसले से आया है।
आगे क्या होगा: बोर्ड, परीक्षण और संगरामपुर की बारी
अब सवाल यह है कि संगरामपुर में दूसरा बोर्ड कब लगेगा, और उससे पहले जिला प्रशासन का परीक्षण क्या कहेगा। अगर प्रशासन बोर्ड को बरकरार रखता है, तो अभियान और गाँवों तक फैल सकता है। गाँव के चौराहे पर लगा बोर्ड अभी भी वहीं है, और हर गुजरने वाला यही सोचता होगा कि अगली खबर क्या लाएगी, और क्या चंगाई प्रार्थना सभाओं पर लगी रोक आने वाले दिनों में भी बनी रहेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ग्राम सभा ने ईसाई पादरियों, प्रचारकों और मिशनरियों के प्रवेश पर रोक और बीमारी ठीक करने के नाम पर होने वाली चंगाई प्रार्थना सभाओं पर पाबंदी का फैसला किया; बोर्ड बोड़ेया चौक पर लगाया गया।
पंचायत ने PESA की धारा 4 का हवाला दिया, जो ग्राम सभाओं को परंपराओं, रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक पहचान और विवाद समाधान की रक्षा का अधिकार देती है; टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार अधिनियम प्रवेश पर रोक का अधिकार नहीं देता, और वैधता अपुष्ट थी।
रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने अनुमंडल अधिकारी और स्थानीय पुलिस को मामले का परीक्षण करने को कहा है; परीक्षण के नतीजे के बारे में अभी कोई जानकारी रिपोर्टों में नहीं आई है।
रिपोर्टों में किसी ईसाई नेता या प्रभावित पादरी की कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है। इससे पहले पुरियो पंचायत के हरमू सलोटोली और लोहरदगा के हाटी गाँव में भी ऐसे बोर्ड लगे थे।
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