छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया

रविवार की सुबह चर्च में प्रार्थना के लिए इकट्ठा हुआ एक साधारण आदिवासी ईसाई परिवार अपनी आस्था के सबसे शांत क्षण में था, और उसी प्रार्थना सभा पर कार्रवाई की शिकायत अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुँच गई है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया।
याचिका ईसाई आदिवासी महासभा ने दायर की है, जो राज्य के आदिवासी ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करती है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 के प्रावधान धार्मिक गतिविधियों पर मनमानी पाबंदियाँ लगाते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस कानून के तहत चर्च में रविवार को होने वाली प्रार्थना सभाओं पर भी अधिकारियों की तरफ से कार्रवाई की जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई की, और पीठ में न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहाना भी शामिल थे। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले को उत्तर प्रदेश और राजस्थान के समान धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं के साथ सुना जाएगा। राज्य सरकार ने अभी अपना जवाब दाखिल नहीं किया था, और अदालत ने चुनौती के गुण-दोष पर इस चरण में कोई विचार व्यक्त नहीं किया था।
«याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत आजादी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।»
— याचिका का सार, आजतक की रिपोर्ट के अनुसार
यह आरोप याचिकाकर्ताओं का है, अदालत का फैसला नहीं है, और इस फर्क को समझना इस खबर की सबसे जरूरी बात है। याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि स्वेच्छा से धर्म बदलने के लिए भी सार्वजनिक जानकारी देने और सरकारी मंजूरी से जुड़ी कई प्रक्रियाएँ पूरी करनी पड़ती हैं।
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026: याचिका में क्या आरोप लगाए गए
याचिका में लालच की व्यापक परिभाषा को चुनौती दी गई है, जिसमें बेहतर जीवनशैली के वादे को भी लालच माना गया है। एक धर्म की दूसरे धर्म के खिलाफ महिमामंडन को भी प्रतिबंधित प्रलोभन माना गया है, और याचिका का कहना है कि ये परिभाषाएँ साधारण धार्मिक प्रचार और मानवीय कार्यों को भी अपनी चपेट में ले सकती हैं।
याचिका के अनुसार, कानून में धर्मांतरण के 30 दिन के भीतर नई घोषणा और उसके 21 दिन के भीतर अनिवार्य व्यक्तिगत उपस्थिति की शर्त है। पालन न होने पर कोई धर्मांतरण प्रमाणपत्र जारी नहीं होगा और धर्मांतरण को अवैध और शून्य माना जाएगा। यह प्रक्रिया, याचिका के अनुसार, स्वेच्छा से धर्म बदलने वाले व्यक्ति पर भी भारी पड़ती है, क्योंकि उसे समय पर घोषणा और उपस्थिति की शर्तें पूरी करनी होती हैं।
कानून में कुछ अपराधों के लिए कम से कम सात साल की कैद का प्रावधान है, जिसे 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है यदि धर्मांतरित व्यक्ति नाबालिग, महिला या अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से हो। सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में आजीवन कारावास का प्रावधान है, और आजतक के अनुसार कुछ अपराधों के लिए 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान भी है।
सुप्रीम कोर्ट नोटिस छत्तीसगढ़: हाई कोर्ट, सात याचिकाएँ और अगली सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का भी रुख किया है, और अगर हाई कोर्ट तय समय में मामले पर सुनवाई कर सके, तो उसके फैसले से सुप्रीम कोर्ट को भी मदद मिलेगी। रजिस्ट्री से कहा गया कि इसी मुद्दे पर दाखिल सभी मामलों की जानकारी जुटाई जाए। आजतक के अनुसार, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर को राज्य सरकार को तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने बताया कि इस मुद्दे पर सात याचिकाएँ हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हाई कोर्ट में लंबित मामलों को भी सुप्रीम कोर्ट में लाया जा सकता है, और कहा कि वह दूसरे याचिकाकर्ताओं से बात करेंगे और स्थानांतरण के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं।
याचिका में धर्मांतरण कराने वाले पादरियों और अन्य धार्मिक अगुवों के पंजीकरण की शर्त पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका में अदालत से यह निर्देश भी माँगा गया है कि छत्तीसगढ़ के अधिकारियों को ईसाई समुदाय की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप करने से रोका जाए, विशेष रूप से ईसाई त्योहारों और प्रार्थना सभाओं के दौरान। याचिका में पैतृक धर्म में वापसी की छूट पर भी आपत्ति है, क्योंकि पैतृक धर्म परिभाषित नहीं है, और याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि प्रावधानों का इस्तेमाल धार्मिक स्थलों को बंद कराने के लिए किया जा रहा है।
चर्च प्रार्थना सभा और धर्म स्वातंत्र्य कानून: इतिहास और अगला कदम
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 को मार्च 2026 में पारित किया था, और अप्रैल में राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद इसने 1968 से लागू पुराने कानून की जगह ली। लॉचक्र के अनुसार, विधानसभा ने विधेयक को मार्च 2026 में ध्वनिमत से पारित किया था, जब विपक्ष ने विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की माँग ठुकराए जाने पर सदन से वॉकआउट किया था। राज्यपाल रमेन डेका ने 7 अप्रैल 2026 को मंजूरी दी थी, और यही कानून अब सुप्रीम कोर्ट की परीक्षा में है।
भारत में ईसाई समुदाय से जुड़ी अन्य खबरें भी इसी बहस के आसपास घूमती हैं, जैसे राजस्थान में 13 ईसाईयों की चार महीने बाद जेल से रिहाई और धर्मांतरण के आरोपों का मामला, छत्तीसगढ़ के कोरबा में पास्टर पीतांबर सिंह की हिरासत और धर्मांतरण का आरोप, सुप्रीम कोर्ट द्वारा तमिलनाडु में चर्च शिखर की तोड़फोड़ पर लगाई गई रोक और भारत में बढ़ते दबाव के बीच कलीसिया के टिके रहने की कहानी। इन खबरों में भी वही सवाल उठता है जो इस याचिका में उठा है: प्रार्थना और आस्था की आजादी की सीमा कहाँ है, और उसे कौन तय करेगा।
अब सबकी नजर सरकर के जवाब पर है, और उस जवाब के बाद अदालत क्या रास्ता अपनाती है, इस पर भी। क्या सातों याचिकाएँ एक साथ सुनी जाएँगी, और क्या रविवार की प्राथना सभाओं पर कार्रवाई की शिकायत पर अदालत कोई राहत देगी, ये सवाल अभी खुले हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अदालत ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 की चुनौती पर केंद्र और राज्य को नोटिस जारी किया।
याचिका ईसाई आदिवासी महासभा ने दायर की है, जो आदिवासी ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करती है।
नहीं, अदालत ने चुनौती के गुण-दोष पर इस चरण में कोई विचार व्यक्त नहीं किया था, और राज्य सरकार ने अभी जवाब दाखिल नहीं किया था।
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने इसे मार्च 2026 में पारित किया था, और राज्यपाल रमेन डेका ने 7 अप्रैल 2026 को मंजूरी दी थी।
याचिका के अनुसार, कुछ अपराधों के लिए कम से कम सात साल की कैद का प्रावधान है, जिसे कुछ मामलों में 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है, और सामूहिक धर्मांतरण में आजीवन कारावास का प्रावधान है।
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