आज से सरधना चर्च में माँ ऑफ ग्रेस का नौ दिवसीय महोत्सव शुरू, 8 नवंबर को मुख्य आयोजन

सरधना के ऐतिहासिक चर्च के प्रांगण में आज सुबह ध्वज लहराया गया, और उसके साथ ही नौ दिन की प्रार्थना की शुरुआत हो गई। देश भर से आने वाले तीर्थयात्री अब रोज़ यहाँ जुटेंगे, रोज़री की प्रार्थना करेंगे और मिस्सा में शामिल होंगे। यह महोत्सव एक दिन का आयोजन नहीं है, बल्कि नौ दिनों तक चलने वाली आस्था की यात्रा है, जिसका मुख्य आयोजन 8 नवंबर को होगा।
मेरठ के सरधना स्थित ऐतिहासिक रोमन कैथोलिक चर्च में माँ ऑफ ग्रेस का नौ दिवसीय महोत्सव 29 अक्टूबर से 8 नवंबर 2026 तक मनाया जा रहा है। यह जानकारी अमर उजाला की 28 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट और जागरण की 29 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में दर्ज है। दोनों रिपोर्टें एक ही कार्यक्रम की पुष्टि करती हैं, और दोनों में शुरुआत और मुख्य आयोजन की तारीखें एक जैसी हैं।
29 अक्टूबर को ध्वजारोहण, रोज़री और नोवेना प्राथना और मिस्सा के साथ महोत्सव की शुरुआत हुई। ध्वजारोहण किसी भी धार्मिक महोत्सव का पहला और सबसे दिखने वाला क्षण होता है, क्योंकि उसी से पता चलता है कि उत्सव शुरू हो गया है। उसके बाद रोज़री और नोवेना की प्रार्थना और मिस्सा ने पहले दिन को उसकी आध्यात्मिक दिशा दी।
पहले दिन की शुरुआत में मेरठ धर्मप्रांत के बिशप भास्कर जेसुराज और फादर वेलेरियन पिंटो उपस्थित रहे, जैसा कि जागरण ने दर्ज किया है। उनकी उपस्थिति पहले दिन को महोत्सव के लिए एक औपचारिक शुरुआत का रूप देती है। कार्यक्रम की जानकारी फादर मार्टिन रावत ने दी, जिनके बताए विवरणों में महोत्सव के दैनिक विषय भी शामिल हैं।
सरधना चर्च महोत्सव: 30 और 31 अक्टूबर के दैनिक विषय
महोतसव के हर दिन का अपना विषय है, और फादर मार्टिन रावत ने उनमें से आने वाले दो दिनों के विषय बताए हैं। 30 अक्टूबर को मरियम को आनंद के स्रोत के रूप में याद किया जाएगा।
31 अक्टूबर को क्रूस के निकट मरियम का स्मरण होगा और रोगियों के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाएगी। ये विषय बताते हैं कि नौ दिन सिर्फ एक जैसे नहीं होंगे, बल्कि हर दिन प्रार्थना का एक अलग केंद्र होगा।
30 अक्टूबर का विषय, मरियम आनंद के स्रोत के रूप में, महोत्सव के शुरुआती दिनों में खुशी और कृतज्ञता का भाव लाता है। 31 अक्टूबर का विषय, क्रूस के निकट मरियम, उसी प्रार्थना को दुख और करुणा की ओर ले जाता है, और रोगियों के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना उसे उन लोगों से जोड़ती है जो बीमारी से जूझ रहे हैं। दो दिन, दो अलग भाव, एक ही महोत्सव के भीतर।
यह चर्च बेगम समरू द्वारा बनवाया गया था, इसे माइनर बेसिलिका का दर्जा प्राप्त है, और देश भर से तीर्थयात्री यहाँ आते हैं, जैसा कि अमर उजाला और जागरण दोनों ने दर्ज किया है। ऐतिहासिक चर्च, बेसिलिका का दर्जा और देश भर से आने वाले तीर्थयात्री, ये तीन बातें मिलकर बताती हैं कि सरधना क्यों सिर्फ एक स्थानीय चर्च नहीं है। इसका नाम दूर-दूर तक जाना जाता है, और महोत्सव के दिनों में यह पहचान और भी साफ दिखती है।
8 नवंबर को सरधना में मुख्य आयोजन: बिशप की अध्यक्षता में मिस्सा और शोभायात्रा
मुख्य आयोजन 8 नवंबर को होगा, जिसमें बिशप की अध्यक्षता में मिस्सा और शोभायात्रा निकाली जाएगी। यह जानकारी अमर उजाला और जागरण दोनों की रिपोर्टों में दर्ज है। नौ दिनों की प्रार्थना का यह अंतिम और सबसे बड़ा दिन होगा, जब महोत्सव अपनी सबसे ऊँची लहर पर पहुँचेगा।
बिशप की अध्यक्षता में मिस्सा का अर्थ है कि मुख्य आयोजन धर्मप्रांत के सबसे वरिष्ठ स्तर पर मनाया जाएगा। शोभायात्रा का अर्थ है कि प्रार्थना चर्च की दीवारों से बाहर निकलकर सार्वजनिक रूप से दिखेगी, और तीर्थयात्री उसमें साथ चलेंगे। मिस्सा और शोभायात्रा का यह मेल महोत्सव के अंतिम दिन को सिर्फ एक प्रार्थना सभा नहीं, बल्कि एक सामूहिक गवाही बना देता है।
भारत में मसीही समुदाय की ऐसी ही सामूहिक प्रार्थना की खबरें पहले भी दर्ज हुई हैं, जैसे बठिंडा में आज ग्रेट रिवाइवल मीटिंग: निहंग सिंहों के विरोध के बीच ईसाई प्रार्थना सभा और भारत में मसीही सताव 2026: बढ़ते दबाव के बीच कलीसिया कैसे टिकी हुई है। सरधना का महोत्सव उन खबरों से अलग है, क्योंकि यहाँ विवाद नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक बेसिलिका में शांतिपूर्ण तीर्थयात्रा और प्रार्थना का उत्सव है।
सरधना तीर्थयात्रा: देश भर से आने वाले तीर्थयात्री और बेगम समरू का चर्च
बेगम समरू द्वारा बनवाया गया यह चर्च अपनी उम्र और अपने दर्जे के कारण भी तीर्थयात्रियों को खींचता है। माइनर बेसिलिका का दर्जा किसी भी चर्च के लिए एक विशेष सम्मान होता है, और सरधना के चर्च को यह दर्जा मिला हुआ है। इतिहास, दर्जा और आस्था, तीनों मिलकर इस जगह को वह बनाते हैं जो वह आज है।
कानून और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल भारत में अलग संदर्भों में भी उठे हैं, जैसे रांची में ग्राम सभा ने पादरियों के प्रवेश पर रोक लगाई: बोर्ड पर PESA का हवाला और छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। सरधना में, इसके विपरीत, महोत्सव खुले तौर पर मनाया जा रहा है, और तीर्थयात्री बिना किसी रोक के प्रार्थना के लिए जुट रहे हैं।
अब नजर 8 नवंबर पर टिकी है, जब बिशप की अध्यक्षता में मिस्सा होगी और शोभायात्रा निकलेगी। क्या उस दिन तीर्थयात्रियों की भीड़ पिछले वर्षों से ज्यादा होगी, क्या दैनिक विषयों वाली प्रार्थनाओं का असर मुख्य आयोजन तक पहुँचेगा, और क्या 30 और 31 अक्टूबर के विषयों पर हुई प्रार्थनाएँ उन लोगों तक पहुँचेंगी जिनके लिए वे की गई थीं, खासकर रोगियों के लिए? नौ दिन की यात्रा अभी शुरू ही हुई है, और उसका सबसे बड़ा दिन अभी बाकी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महोत्सव 29 अक्टूबर से 8 नवंबर 2026 तक मनाया जा रहा है। 29 अक्टूबर को ध्वजारोहण, रोज़री और नोवेना प्रार्थना और मिस्सा के साथ इसकी शुरुआत हुई, और मुख्य आयोजन 8 नवंबर को होगा।
29 अक्टूबर को ध्वजारोहण, रोज़री और नोवेना प्रार्थना और मिस्सा के साथ शुरुआत हुई। उस दिन मेरठ धर्मप्रांत के बिशप भास्कर जेसुराज और फादर वेलेरियन पिंटो उपस्थित रहे, जैसा कि जागरण ने दर्ज किया है।
फादर मार्टिन रावत के अनुसार, 30 अक्टूबर को मरियम आनंद के स्रोत के रूप में याद की जाएँगी, और 31 अक्टूबर को क्रूस के निकट मरियम का स्मरण होगा और रोगियों के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाएगी।
8 नवंबर को बिशप की अध्यक्षता में मिस्सा होगी और शोभायात्रा निकाली जाएगी। यही महोत्सव का मुख्य आयोजन है, जैसा कि अमर उजाला और जागरण दोनों ने दर्ज किया है।
यह चर्च बेगम समरू द्वारा बनवाया गया था और इसे माइनर बेसिलिका का दर्जा प्राप्त है। देश भर से तीर्थयात्री यहाँ आते हैं, जैसा कि अमर उजाला और जागरण ने दर्ज किया है।
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