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📰 FaithStories News Desk · Article #282 · Published: 27 Oct 2026, 05:32 AM PKT

आज: पोप लियो XIV ने भारत के मिशनरी बिशप ओरेस्ते मारेंगो को वेनरेबल घोषित किया — 75 साल की सेवा का सम्मान

सुबह की धुंध में गारो पहाड़ियों की चोटी पर सफेद पहाड़ी चर्च की ओर जाते ग्रामीण
गारो पहाड़ियों में एक पहाड़ी चर्च की ओर सुबह-सुबह जाते ग्रामीण — बिशप ओरेस्ते मारेंगो ने ऐसी ही पहाड़ियों में दशकों तक पैदल चलकर सेवा की थी।

पचहत्तर साल, तीन धर्मप्रांत, और तुरा की पहाडियों में एक कब्र। 24 अक्टूबर 2026 को जब पोप लियो चौदहवें ने बिशप ओरेस्ते मारेंगो को वेनरेबल घोषित किया, तो पूर्वोत्तर भारत की कलीसिया में वह नाम फिर गूंज उठा जो दशकों तक गांव-गांव पैदल चलकर घर-घर पहुंचा था।

पोप ने यह घोषणा 24 अक्टूबर को कार्डिनल मार्सेलो सेमेरारो के साथ एक सभा के दौरान की। कार्डिनल सेमेरारो संतों के कारणों से जुड़े विभाग के प्रमुख हैं। उसी सभा में उनके सद्गुणों को मान्यता देने वाले आदेश की अनुमति दी गई।

यह मान्यता संत बनाए जाने की राह में एक बड़ा कदम है। वेनरेबल की उपाधि का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को संत घोषित कर दिया गया है, बल्कि यह इस बात की औपचारिक मान्यता है कि उसने ईसाई सद्गुणों का वीरतापूर्ण अभ्यास किया था।

मारेंगो का जन्म 29 अगस्त 1906 को इटली के दियानो द'अल्बा में हुआ था। वह कूनेओ प्रांत के एक खेती करने वाले परिवार में पले-बढ़े थे, जहां मजबूत ईसाई आस्था घर की जिंदगी का हिस्सा थी। तेरह साल की उम्र में वह तूरिन चले गए, जहां उन्होंने सेल्सियन समुदाय में अपनी तैयारी शुरू की और संत जॉन बॉस्को द्वारा स्थापित समुदाय के शुरुआती सदस्यों से मुलाकात की।

1923 में वह आठ अन्य नौसिखियों के साथ पूर्वोत्तर भारत पहुंचे। दर्शनशास्त्र की पढ़ाई के साथ-साथ वह गांवों में काम करते थे, नए विश्वासियों को तैयार करते थे और पहली कैथोलिक बस्तियों की मदद करते थे। 2 अप्रैल 1932 को वह पादरी बने, और उसके बाद उनका पूरा जीवन उन्हीं पहाड़ियों और गांवों के नाम हो गया।

बिशप ओरेस्ते मारेंगो को वेनरेबल के रूप में मान्यता मिलना पूर्वोत्तर भारत की कलीसिया के लिए खुशी और आध्यात्मिक प्रोत्साहन का स्रोत है, क्योंकि उनका विश्वास, विनम्रता और मिशनरी समर्पण का जीवन आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

1951 में मारेंगो को नए स्थापित डिब्रूगढ़ धर्मप्रांत का पहला बिशप नियुक्त किया गया। उसी साल 27 दिसंबर को तूरिन के मेरी हेल्प ऑफ क्रिश्चियंस बेसिलिका में उनका बिशप अभिषेक हुआ। वह 1964 तक डिब्रूगढ़ की अगुवाई करते रहे, और फिर तेजपुर के बिशप बने।

डिब्रूगढ़ से तेजपुर और तुरा तक: बिशप ओरेस्ते मारेंगो की मिशनरी सेवा

तेजपुर के बाद मारेंगो ने मेघालय की गारो पहाड़ियों में स्थित तुरा के अपोस्टोलिक प्रशासक के रूप में सेवा की। इस दौरान उन्होंने मिशन केंद्र स्थापित किए, स्थानीय युवाओं को पादरी बनने के लिए प्रोत्साहित किया और आम विश्वासियों की भूमिका को भी उतना ही जरूरी माना।

जब पादरियों की कमी हुई, तो उन्होंने देश के दूसरे हिस्सों से, जिनमें केरल भी शामिल था, पादरियों का स्वागत किया। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने पाकिस्तान से भागकर आए लोगों की मदद भी की, और यह काम उन्होंने किसी दिखावे के बिना, चुपचाप किया।

यह सेवा आसान जमीन पर नहीं हुई थी। मैटर्स इंडिया के अनुसार, उनका कार्यक्षेत्र कठिन पहाड़ी रास्तों, भाषाओं की विविधता और सीमित बुनियादी सुविधाओं वाला था। फिर भी उनका तरीका एक ही रहा: लोगों के बीच रहना और सेवा के जरिए सुसमाचार को जीना।

सत्तर साल की उम्र में अपोस्टोलिक प्रशासक का पद छोड़ने के बाद भी मारेंगो भारत नहीं लौटे। वह पूर्वोत्तर में ही रहे और स्थानीय पादरियों की मदद करते रहे। 30 जुलाई 1998 को अस्पताल में बार-बार भर्ती होने के बाद तुरा में उनका निधन हो गया, और उन्हें उन्हीं लोगों के बीच दफनाया गया जिनकी उन्होंने जिंदगी भर सेवा की थी।

वेनरेबल का मतलब क्या है: संत बनने की राह में दूसरा कदम

कैथोलिक कलीसिया में संत बनने की प्रक्रिया में पहला कदम ईश्वर का सेवक कहलाना होता है। दूसरा कदम वेनरेबल है, तीसरा धन्य यानी बीटिफिकेशन है, और अंतिम चरण संतत्व यानी कैननाइजेशन है। बीटिफिकेशन के लिए आमतौर पर उम्मीदवार की मध्यस्थता से जुड़े किसी चमत्कार की मान्यता जरूरी होती है।

मारेंगो के साथ कुल छह लोगों को वेनरेबल घोषित किया गया, जिनमें पेरू के बिशप फ्रीड्रिख काइजर डेपेल, मार्गरीटा बावोसी, पादरी डोमेनिको पोग्लियानी और एलेस्सांद्रो विटेट्टी, तथा कैपुचिन भाई दानिएले शामिल थे।

पूर्वोत्तर भारत के लिए यह सम्मान और भी खास है, क्योंकि मारेंगो वहां काम करने वाले तीसरे वेनरेबल हैं। उनसे पहले 2016 में स्टीफन फेरांडो और मई 2026 में फादर कॉन्स्टेंटाइन वेंद्रामे को यह मान्यता मिली थी, और तीनों ही सेल्सियन समुदाय से जुड़े थे।

भारत में कलीसिया की सेवा की ऐसी ही जीवंत तस्वीरें पहले भी सामने आती रही हैं, जैसे मंगलुरु में हिंदू-मुस्लिम पड़ोसियों के साथ मिलकर चर्च बनाने की कहानी और सरधना चर्च के तीर्थयात्रा महापर्व की खबर। लेकिन मारेंगो की कहानी एक व्यक्ति की पूरी जिंदगी है, जो गांव-गांव चलती रही।

पूर्वोत्तर की कलीसिया की मौजूदा तस्वीर में नागालैंड से दिल्ली तक बढ़ती कलीसिया की कहानी और मणिपुर के कुकी-जो ईसाइयों की मांग की खबर भी शामिल हैं। मारेंगो की मान्यता उसी क्षेत्र की पुरानी जड़ों की याद दिलाती है, जिन पर आज की कलीसिया खड़ी है।

मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने इस घोषणा को गारो पहाड़ियों और पूरे पूर्वोत्तर के लिए गर्व और सम्मान का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि मारेंगो ने पांच दशक से अधिक समय तक पूर्वोत्तर की सेवा की, और मिशनरियों का योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

सिस्टर दीप्ति प्रधान ने कहा कि मारेंगो का उदाहरण मिशनरियों को याद दिलाता है कि पवित्रता करुणा, त्याग और जरूरतमंदों की वफादार सेवा के जरिए जी जाती है। फादर सुग्रीब बलियारसिंह ने कहा कि सच्चा सुसमाचार प्रचार लोगों के साथ चलने, उनकी गरिमा का सम्मान करने और गरीबों की करुणा से सेवा करने का नाम है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मारेंगो की कहानी आगे कहां जाएगी। बीटिफिकेशन के लिए चमत्कार की मान्यता की प्रक्रिया अभी बाकी है, और गारो पहाड़ियों के युवा आज उसी सवाल के सामने हैं: क्या एक जिंदगी, जो पैदल चलकर गांव-गांव पहुंची थी, आने वाली पीढ़ियों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए बुला पाएगी?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिशप ओरेस्ते मारेंगो कौन थे?

इटली में जन्मे सेल्सियन मिशनरी बिशप, जो 1923 में पूर्वोत्तर भारत आए और डिब्रूगढ़ के पहले बिशप, तेजपुर के बिशप और तुरा के अपोस्टोलिक प्रशासक रहे (स्रोत: वेटिकन न्यूज़)।

पोप ने उन्हें वेनरेबल कब घोषित किया?

24 अक्टूबर 2026 को, कार्डिनल मार्सेलो सेमेरारो के साथ सभा में पोप लियो XIV ने उनके वीरतापूर्ण सद्गुणों को मान्यता देने वाले आदेश को मंजूरी दी (स्रोत: मैटर्स इंडिया)।

वेनरेबल का क्या मतलब है?

यह संत बनने की प्रक्रिया का दूसरा कदम है: पहले ईश्वर का सेवक, फिर वेनरेबल, फिर धन्य, और अंत में संत। वेनरेबल का मतलब संत घोषित होना नहीं है (स्रोत: मैटर्स इंडिया)।

उन्होंने भारत में कहां-कहां सेवा की?

डिब्रूगढ़, तेजपुर और तुरा में, जहां उन्होंने मिशन केंद्र स्थापित किए, स्थानीय युवाओं को पादरी बनने के लिए प्रोत्साहित किया और आम विश्वासियों की सेवा की (स्रोत: वेटिकन न्यूज़)।

उनके साथ और किन्हें वेनरेबल घोषित किया गया?

कुल छह लोगों को, जिनमें पेरू के बिशप फ्रीड्रिख काइजर डेपेल, मार्गरीटा बावोसी, डोमेनिको पोग्लियानी, एलेस्सांद्रो विटेट्टी और भाई दानिएले शामिल थे (स्रोत: वेटिकन न्यूज़)।

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