सरधना चर्च तीर्थयात्रा महापर्व 29 अक्टूबर से: 11 दिन, लाखों श्रद्धालु, 8 नवंबर को भव्य शोभायात्रा

लाखों लोग, ग्यारह दिन, और एक चर्च जिसके दरवाजे पर हर मुराद पूरी होने की बात कही जाती है। मेरठ के सरधना स्थित रोमन कैथोलिक चर्च में 29 अक्टूबर से वार्षिक तीर्थयातरा का महापर्व शुरू होने जा रहा है, और इस बार भी देश और दुनिया से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
फादर मार्टिन रावत ने कार्यक्रम की रूपरेखा साझा की है। तीर्थयात्रा का भव्य शुभारंभ 29 अक्टूबर को शाम 4 बजे होगा, जिसमें पारंपरिक ध्वजारोहण, माला विनती और पवित्र मिस्सा बलिदान शामिल होंगे। यह सिर्फ एक उद्घाटन नहीं होगा, बल्कि ग्यारह दिनों की आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होगी, जो 8 नवंबर तक चलेगी।
इस महापर्व की खासियत इसका रोजाना का क्रम है। सात नवंबर तक रोजाना शाम 4 बजे श्रद्धालु माला विनती और मिस्सा बलिदान में शामिल होंगे। सात नवंबर को सुबह 6, 10 और शाम 4 बजे भी मिस्सा बलिदान होगा। उसी दिन शाम 6 बजे पंजाबी भाषा में पवित्र मिस्सा बलिदान होगा, और रात 8 बजे विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की जाएगी।
माता मरियम के महोत्सव का मुख्य समारोह आठ नवंबर को होगा, और उसी दिन चर्च परिसर से विशाल शोभायात्रा निकलेगी।
आठ नवंबर की सुबह 6 और 8 बजे पवित्र मिस्सा होगा। इसके बाद सुबह 10 बजे भव्य धर्माध्यक्षीय समारोही मिस्सा बलिदान का आयोजन किया जाएगा। दोपहर 12 बजे बीमारों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रार्थना होगी, और धार्मिक वस्तुओं को आशीष भी दी जाएगी। बीमारों के लिए यह प्रार्थना इस महापर्व के सबसे मार्मिक क्षणों में से एक मानी जाती है, क्योंकि दूर-दूर से लोग अपने बीमार परिजनों के लिए प्रार्थना लेकर यहां आते हैं।
सरधना चर्च तीर्थयात्रा महापर्व: इलाहाबाद धर्माध्यक्ष की अगुवाई में मुख्य समारोह
मुख्य समारोह के मुख्य अनुष्ठाता इलाहाबाद धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष लुईस मस्करेनहास होंगे। उनकी मौजूदगी इस आयोजन को सिर्फ एक स्थानीय मेले से ऊपर उठाकर पूरे धर्मप्रांत के उत्सव में बदल देती है। श्रद्धालुओं के लिए धर्माध्यक्ष की अगुवाई में मिस्सा में शामिल होना इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण होता है।
आठ नवंबर को शाम 3 बजे चर्च परिसर से विशाल शोभायात्रा निकलेगी। यह शोभायात्रा संत चार्ल्स इंटर कॉलेज स्थित बेगम समरू के महल तक जाएगी। इसमें ऐतिहासिक तबर्रुक — माता मरियम का रेलिक — श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ शामिल होगा। शोभायात्रा के समापन पर पवित्र यूखरिस्त की आशीष दी जाएगी, और इसी के साथ महापर्व अपने चरम पर पहुंचेगा।
यह शोभायात्रा सिर्फ एक जुलूस नहीं है, बल्कि सरधना की पूरी कहानी का चलता-फिरता प्रतीक है। बेगम समरू के महल तक जाने का रास्ता उस इतिहास को याद दिलाता है, जिसने इस चर्च को जन्म दिया। श्रद्धालु जब उस रास्ते पर चलते हैं, तो वे सिर्फ एक शोभायात्रा में नहीं, बल्कि दो सौ साल पुरानी आस्था की यात्रा में शामिल होते हैं।
बेगम समरू चर्च: 1809 से 1822 तक बना आस्था का प्रतीक
सरधना का यह ऐतिहासिक चर्च सौहार्द, आस्था और इतिहास का बेजोड़ नमूना माना जाता है। मेरठ मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित इस चर्च के बारे में कहा जाता है कि यहां जो भी आता है, उसकी मुराद पूरी होती है। चर्च के गाइड सेमुअल एल्बर्ट के अनुसार, 1809 में इस चर्च का निर्माण शुरू हुआ था और 1822 में बनकर तैयार हुआ था।
इस चर्च को फरजाना उर्फ समरू बेगम ने बनवाया था। बेगम फरजाना ने अपने पति समरू की मौत के बाद कैथोलिक धर्म अपना लिया था, और अपने पति की ख्वाहिश पूरी करने तथा प्रभु यीशु की मां के आदर-सम्मान में इस ऐतिहासिक रोमन कैथलिक चर्च का निर्माण कराया था। यही वजह है कि इस चर्च में प्रभु यीशु की नहीं, बल्कि मां मरियम की पूजा की जाती है, और दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं को लेकर यहां आते हैं।
चर्च के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। गाइड के अनुसार, इस चर्च को बनाने में लगभग चार लाख रुपये का खर्च हुआ था, और निर्माण के लिए 25 पैसे प्रतिदिन के हिसाब से मिस्त्री को रखा गया था, जो उस दौर का सबसे महंगा मिस्त्री था। उस जमाने के हिसाब से यह रकम इस बात का सबूत है कि बेगम समरू ने इस चर्च को कितनी गंभीरता और श्रद्धा से बनवाया था।
आज यह चर्च पूरे देश में प्रसिद्ध है, और हर साल की तीर्थयात्रा इस प्रसिद्धि को नए सिरे से जिंदा करती है। जो श्रद्धालु 29 अक्टूबर से यहां पहुंचेंगे, वे सिर्फ एक उत्सव में शामिल नहीं होंगे, बल्कि उस परंपरा में शामिल होंगे जो एक मुस्लिम महिला के कैथोलिक धर्म अपनाने, एक रानी की श्रद्धा और दो सौ साल की प्रार्थनाओं से बनी है।
भारत में ईसाई आस्था की इस तरह की जीवंत तस्वीरें पहले भी सामने आती रही हैं, जैसे खूंटी में फादर पर हमले के बाद हुई गिरफ्तारियों की खबर और मणिपुर में कुकी-जो ईसाइयों की राष्ट्रपति शासन की मांग। लेकिन सरधना की कहानी एक अलग रंग दिखाती है: आस्था का उत्सव, इतिहास का गौरव और एक ऐसी परंपरा जो हर साल लाखों लोगों को एक साथ ले आती है।
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य मामलों में रायपुर में धर्म परिवर्तन के आरोपों पर FIR की खबर भी सामने आई है, जहां जांच जारी है।
29 अक्टूबर को शाम 4 बजे जब ध्वजारोहण होगा और माला विनती की आवाज गूंजेगी, तो सरधना एक बार फिर उसी सवाल के सामने खड़ा होगा जो हर तीर्थयात्री अपने साथ लेकर आता है: इस ग्यारह दिन की यात्रा के बाद, जब शोभायात्रा बेगम समरू के महल तक पहुंचेगी और यूखरिस्त की आशीष मिलेगी, तो कौन सी मुराद पूरी होगी और कौन सी प्रार्थना अगले साल तक इंतजार करेगी?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
29 अक्टूबर 2026 को शाम 4 बजे ध्वजारोहण, माला विनती और मिस्सा से, और यह 8 नवंबर तक चलेगा (स्रोत: अमर उजाला)।
8 नवंबर को, इलाहाबाद धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष लुईस मस्करेनहास की अगुवाई में धर्माध्यक्षीय समारोही मिस्सा होगा (स्रोत: अमर उजाला)।
8 नवंबर को शाम 3 बजे चर्च परिसर से संत चार्ल्स इंटर कॉलेज स्थित बेगम समरू के महल तक, जिसमें माता मरियम का ऐतिहासिक तबर्रुक शामिल होगा (स्रोत: अमर उजाला)।
फरजाना उर्फ बेगम समरू ने; निर्माण 1809 में शुरू हुआ और 1822 में पूरा हुआ (स्रोत: ईटीवी भारत)।
देश और दुनिया से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है (स्रोत: अमर उजाला)।
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