आज: छत्तीसगढ़ के कोरबा में पास्टर पीतांबर सिंह हिरासत में — बजरंग दल ने लगाया धर्मांतरण का आरोप

रविवार की सुबह थी, और ओमपुर गांव के एक साधारण मकान में प्रार्थना की आवाज़ गूंज रही थी। फिर दरवाज़े पर शोर हुआ — बजरंग दल के कार्यकर्ता पहुंच चुके थे। कुछ ही घंटों में पास्टर पीतांबर सिंह पुलिस की हिरासत में थे, और एक शांत प्रार्थना सभा राष्ट्रीय सुर्खी बन चुकी थी।
18 अक्टूबर 2026 की सुबह छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के रजगामार क्षेत्र के ओमपुर गांव में एक निजी मकान में प्रार्थना सभा चल रही थी। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मौके पर पहुंचकर आरोप लगाया कि सभा में अवैध धर्मांतरण हो रहा है और इसके लिए अनुमति नहीं ली गई थी (UCA News, रायगढ़ अपडेट)।
पुलिस पास्टर पीतांबर सिंह समेत कुछ लोगों को हिरासत में लेकर चौकी ले गई। कार्यकर्ताओं का दावा है कि करीब 15 हिंदू परिवारों को प्रार्थना से बीमारी ठीक होने और आर्थिक मदद का लालच दिया गया — हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है (UCA News)।
कोरबा प्रार्थना सभा विवाद: क्या हुआ 18 अक्टूबर की सुबह
रजगामार चौकी प्रभारी विनोद सिंह ने कहा कि पुलिस ने हालात काबू करने के लिए कार्रवाई की और दल की शिकायत की जांच हो रही है (UCA News)। यानी अभी तक आरोप सिर्फ आरोप हैं — जांच जारी है, फैसला बाकी है।
बजरंग दल के जिला संयोजक राणा मुखर्जी ने जांच और कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने चेतावनी भी दी कि उचित कार्रवाई न होने पर संवैधानिक तरीके से बड़ा आंदोलन किया जाएगा (सच आप तक)।
«पुलिस ने हालात काबू में करने के लिए कार्रवाई की; दल की शिकायत की जांच हो रही है» — विनोद सिंह, रजगामार पुलिस चौकी प्रभारी (UCA News)
यह पैटर्न छत्तीसगढ़ में नया नहीं है। भारत में मसीही सताव 2026 के बीच कलीसिया के टिके रहने की कहानी बताती है कि दबाव बढ़ने के बावजूद विश्वासी अपनी आस्था पर कायम हैं — कोरबा की घटना उसी लंबी कड़ी का ताज़ा हिस्सा है।
छत्तीसगढ़ में ईसाई सताव 2026: प्रार्थना पर सवाल क्यों
सबसे बड़ा सवाल यही है: क्या प्रार्थना करना अपराध है? प्रॉसिक्यूशन रिलीफ के पास्टर शिबू थॉमस ने कहा कि वे पास्टर और विश्वासियों की हिरासत को लेकर गहरी चिंता में हैं, और उन्होंने पुलिस से निष्पक्ष जाच की मांग की है (UCA News)।
«प्रार्थना कोई अपराध नहीं है, और शांतिपूर्ण ढंग से अपने धर्म का पालन करना भारत के संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार है» — पास्टर शिबू थॉमस, प्रॉसिक्यूशन रिलीफ (UCA News)
पास्टर थॉमस की बात संविधान के अनुच्छेद 25 की याद दिलाती है — हर नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार का अधिकार है। सवाल यह है कि प्रार्थना सभा और जबरन धर्मांतरण के बीच की रेखा कौन खींचेगा, और कैसे।
आरोप लगाने वालों का कहना है कि बीमारी ठीक होने और आर्थिक मदद का लालच दिया गया। लेकिन लालच का आरोप लगाना एक बात है, उसे साबित करना दूसरी — और अभी तक कोई स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
ऐसे मामलों में पश्चिम बंगाल में बाइबल सम्मेलन पर हुए हमले जैसी घटनाओं की याद ताज़ा हो जाती है, जहां 1,900 आदिवासी विश्वासी प्रभावित हुए थे। पैटर्न दोहराता है: आरोप, विरोध, हिरासत — और फिर लंबी कानूनी लड़ाई।
पीतांबर सिंह पास्टर हिरासत: आगे क्या होगा
अभी मामला जांच के दायरे में है। पुलिस दल की शिकायत की जांच कर रही है, और ईसाई अधिकार संगठन निष्पक्षता की मांग कर रहे हैं। पास्टर पीतांबर सिंह और हिरासत में लिए गए अन्य लोगों का भविष्य इसी जांच पर टिका है।
छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण-विरोधी कानून पहले से ही सख्त हैं, और ऐसे हर मामले में कानून की व्याख्या ही सब कुछ तय करती है। क्या निजी मकान में प्रार्थना के लिए अनुमति चाहिए? क्या सामूहिक प्रार्थना अपने आप में धर्मांतरण का सबूत है? ये सवाल अदालतों में उठेंगे।
इस बीच ओमपुर गांव की वे ईसाई परिवारें, जो उस रविवार सुबह प्रार्थना में झुकी थीं, अब डरी हुई हैं। तमिलनाडु में चर्च शिखर की तोड़फोड़ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक जैसी खबरें उम्मीद देती हैं कि न्याय व्यवस्था संतुलन बनाए रखेगी।
और नागालैंड से दिल्ली तक बढ़ती कलीसिया की अनकही कहानी याद दिलाती है कि भारतीय कलीसिया दबाव में टूटती नहीं — वह प्रार्थना में और गहरी होती जाती है।
अब सबकी निगाहें रजगामार पुलिस की जांच पर हैं: क्या आरोपों में दम निकलेगा, या यह भी उन मामलों में शामिल हो जाएगा जहां प्रार्थना को अपराध बनाने की कोशिश नाकाम रही? जवाब आने में वक्त लगेगा — लेकिन उस रविवार सुबह की प्रार्थना की गूंज अभी थमी नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ओमपुर गांव में एक निजी मकान में चल रही प्रार्थना सभा पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अवैध धर्मांतरण का आरोप लगाया, जिसके बाद पुलिस पास्टर पीतांबर सिंह समेत कुछ लोगों को हिरासत में ले गई (UCA News)।
दल का दावा है कि सभा में करीब 15 हिंदू परिवारों को प्रार्थना से बीमारी ठीक होने और आर्थिक मदद का लालच दिया गया, और अनुमति नहीं ली गई थी। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
रजगामार चौकी प्रभारी विनोद सिंह के अनुसार पुलिस ने हालात काबू करने के लिए कार्रवाई की और दल की शिकायत की जाच जारी है (UCA News)।
प्रॉसिक्यूशन रिलीफ के पास्टर शिबू थॉमस ने गहरी चिंता जताई और निष्पक्ष जांच की मांग की, कहा — प्रार्थना कोई अपराध नहीं है और शांतिपूर्ण धर्म-पालन संविधान का मौलिक अधिकार है।
यह मामला अभी जांचाधीन है। निजी स्थान पर शांतिपूर्ण प्रार्थना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित अधिकार है, लेकिन धर्मांतरण-विरोधी कानूनों की व्याख्या अदालतें तय करेंगी।
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