फादर डी. एस. अमलोरपावदास: भारतीय ईसाई धर्म को अपनी आत्मा देने वाले पादरी अब 'ईश्वर के सेवक'

36 साल पहले, मैसूर से बेंगलुरु जाते हुए एक सड़क हादसे में एक पादरी की मौत हो गई थी। वह 57 साल के थे। उनके पीछे एक सवाल रह गया था: क्या भारत का ईसाई यूरोपीय बनकर ही सच्चा ईसाई बन सकता है, या वह पूरी तरह भारतीय रहकर भी पूरी तरह ईसाई रह सकता है?
फादर दुरईस्वामी साइमन अमलोरपावदास (1932–1990) को वेटिकन द्वारा संतत्व की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति मिलने के बाद 'ईश्वर के सेवक' के रूप में मान्यता दी गई है, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। पुडुचेरी और कुडलूर के आर्चबिशप फ्रांसिस कालिस्ट ने 10 सितंबर को अपनी सलाहकार परिषद के सामने इस फैसले की घोषणा की थी, यूसीए न्यूज़ और कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार।
यह मान्यता संतत्व की घोषणा नहीं है। कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार, 'ईश्वर के सेवक' की घोषणा पवित्रता को मान्यता देने का पहला औपचारिक चरण है, जिसके बाद धर्मप्रांतीय जांच में उनके जीवन, लेखन, गुणों और पवित्रता की ख्याति की जांच होगी। यूसीए न्यूज़ ने साफ लिखा है कि वेटिकन की अनुमति का मतलब यह नहीं है कि चर्च ने उनके हर प्रस्ताव का समर्थन कर दिया है।
अमलोरपावदास का जन्म 15 जून 1932 को पुडुचेरी के पास कल्लेरी में हुआ था, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। वह तमिल संस्कृति में गहराई से जुड़े एक कैथोलिक परिवार में पले-बढ़े। बेंगलुरु के सेंट पीटर्स सेमिनरी में पढ़ाई के बाद 12 अप्रैल 1959 को वह पादरी बने, यूसीए न्यूज़ और कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार।
अमलोरपावदास और एनबीसीएलसी: बेंगलुरु में भारतीय चर्च के नवीनीकरण की प्रयोगशाला
तमिलनाडु में शुरुआती सेवा के बाद, अमलोरपावदास पेरिस के इंस्टिट्यूट कैथोलिक में पढ़ने गए, जहां उन्होंने कैटेकेटिक्स और धर्मशास्त्र में उच्च योग्यताएं हासिल कीं, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। उनका डॉक्टरेट शोध, «डेस्टिनी ऑफ द चर्च इन इंडिया टुडे», उसी चिंता को लेकर था जो उनके जीवन का काम बन गई: भारत में ईसाई धर्म का भविष्य सिर्फ संस्थाओं के विस्तार पर नहीं, बल्कि भारतीय जीवन और संस्कृति के साथ उसके सार्थक रिश्ते पर निर्भर करता है।
उनका सबसे स्थायी संस्थागत योगदान बेंगलुरु में नेशनल बाइबिलिकल, कैटेकेटिकल एंड लिटर्जिकल सेंटर (एनबीसीएलसी) की स्थापना था, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने अक्टूबर 1966 में उन्हें इसका संस्थापक निदेशक नियुक्त किया था, और वह 6 फरवरी 1967 को इसकी स्थापना से सितंबर 1982 तक इसका नेतृत्व करते रहे, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। कैथोलिक कनेक्ट ने भी लिखा है कि वह 15 साल तक इसके निदेशक रहे।
सेमिनारों, कार्यशालाओं, शोध और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए इस केंद्र ने देश भर के कैथोलिक समुदायों की सोच और प्रथाओं को प्रभावित किया, यूसीए न्यूज़ के अनुसार।
उनका तरीका सिर्फ यूरोपीय धर्मिक समारोहों में कभी-कभार भारतीय प्रतीक जोड़ना नहीं था, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। वह चाहते थे कि ईसाई भारतीय लोगों के लिए समझ में आने वाली श्रेणियों के जरिए अपनी आस्था जिएं।
भारतीयकरण पर बहस: दीया, फूल, मौन और पहचान का सवाल
अमलोरपावदास खास तौर पर कैथोलिक पूजा के भारतीयकरण से जुड़े, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। पूजा में अनुकूलन के आंदोलन में श्रद्धा के भारतीय हाव-भाव, दीपक, फूल, भक्ति संगीत, मौन और चिंतनशील प्राथना शामिल थे।
«ईसाइयों को प्रामाणिक रूप से ईसाई बनने के लिए सांस्कृतिक रूप से यूरोपीय नहीं बनना चाहिए।» — यूसीए न्यूज़ के अनुसार, यही अमलोरपावदास का केंद्रीय विश्वास था।
लेकिन उनके विचार सबको स्वीकार नहीं थे, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। कुछ कैथोलिकों को डर था कि भारतीय प्रतीकों को पूजा में जरूरत से ज्यादा अपनाने से ईसाई पहचान कमजोर हो सकती है। दूसरों ने ऐसे अनुकूलन को जरूरी माना, ताकि ईसाई धर्म को पश्चिमी धर्म समझे जाने की धारणा से उबरा जा सके।
कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार, 1982 में वह मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने, और उन्होंने चामुंडी पहाड़ियों के पास अंजलि आश्रम की स्थापना की।
उन्हें स्वामी अमलोरानंद के नाम से भी जाना जाता था, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। कैथोलिक कनेक्ट ने लिखा है कि सादगी, प्रार्थना और चिंतन का जीवन उनकी पहचान था।
'ईश्वर के सेवक' का क्या मतलब है: निहिल ओब्स्टैट, 20 अक्टूबर की मिसा और आगे की जांच
संतत्व की प्रक्रिया को गति 2016 में मिली, जब आर्चबिशप ए. आनंदारायर ने औपचारिक याचिका सौंपी, यूसीए न्यूज़ के अनुसार। आर्चबिशप कालिस्ट की अपीलों और स्पष्टीकरणों के बाद, 15 जुलाई 2026 को पवित्र धर्मासन ने 'निहिल ओब्स्टैट' का आदेश जारी किया, कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार।
इसके बाद, 20 अक्टूबर को पुडुचेरी के इमैक्युलेट कंसेप्शन कैथेड्रल में धन्यवाद मिसा के साथ धर्मप्रांतीय चरण की शुरुआत हुई, कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार। यूसीए न्यूज़ ने लिखा है कि सितंबर में एनबीसीएलसी ने अपने संस्थापक की याद में एक संग्रहालय का उद्घाटन किया और चर्च की सेवा के छह दशक मनाने शुरू किए।
अमलोरपावदास की मृत्यु 25 मई 1990 को मैसूर से बेंगलुरु जाते समय एक सड़क हादसे के बाद हुई थी, यूसीए न्यूज़ और कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार। अब जांच उनके जीवन, लेखन और गुणों की होगी — और उनके सवालों की भी।
भारत में ईसाई समुदाय की खबरें इस साइट पर और भी पढ़ी जा सकती हैं, जैसे मणिपुर में पांच कुकी लोगों की हत्या से शांति वार्ता के खतरे में पड़ने की खबर, गुमला में कब्र पर्व, जहां 750 कब्रों पर मोमबत्तियां जलाई गईं, गोवा में सभी संतों का पर्व, जहां सैकड़ों बच्चे संत बनकर चर्च पहुंचे, वेरापोली के आर्चबिशप का परिवारों से रोज़री की परंपरा बचाकर रखने का आह्वान और छत्तीसगढ़ के भंडारडीगी में ईसाई परिवारों पर हमले की खबर।
जब धर्मप्रांतीय जांच शुरू होगी, तो एक सवाल जांचकर्ताओं के साथ-साथ हर भारतीय ईसाई के सामने रहेगा: क्या एक पादरी, जो 36 साल पहले एक सड़क पर मर गया था, आज की चर्च को यह सिखा सकता है कि भारतीय होना और ईसाई होना एक ही सांस में कैसे कहा जाए?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एक भारतीय कैथोलिक धर्मशास्त्री (1932–1990), जिन्होंने बेंगलुरु में एनबीसीएलसी की स्थापना की और ईसाई आस्था को भारतीय संस्कृति में जड़ें जमाने का काम किया, यूसीए न्यूज़ और कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार।
यह संतत्व की प्रक्रिया का पहला औपचारिक चरण है, संतत्व की घोषणा नहीं। वेटिकन की अनुमति के बाद धर्मप्रांतीय जांच में उनके जीवन, लेखन और गुणों की जांच होगी, कैथोलिक कनेक्ट और यूसीए न्यूज़ के अनुसार।
कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार, 'निहिल ओब्स्टैट' का आदेश 15 जुलाई 2026 को जारी हुआ। आर्चबिशप फ्रांसिस कालिस्ट ने 10 सितंबर को सलाहकार परिषद के सामने फैसले की घोषणा की, यूसीए न्यूज़ और कैथोलिक कनेक्ट के अनुसार।
यूसीए न्यूज़ के अनुसार, भारतीय प्रतीकों को कैथोलिक पूजा में अपनाने पर कुछ लोगों को ईसाई पहचान कमजोर होने का डर था, जबकि दूसरों ने इसे ईसाई धर्म को पश्चिमी धर्म समझे जाने की धारणा से उबरने के लिए जरूरी माना।
नहीं। यूसीए न्यूज़ (2 नवंबर 2026) और कैथोलिक कनेक्ट (28 अक्टूबर 2026) दोनों को खोला गया है। तारीखों और तथ्यों में जहां फर्क है, वहां लेख में स्रोत का नाम दिया गया है।
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